माँ की ममता
हर स्री में जन्म के साथ ही मां के गुण निहित होते है और शिशु को जन्म देने के बाद ये सुप्त गुण उभरने लगते हैं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि जब तक स्री मां नहीं बनती, वह सम्पूर्णता को प्राप्त नहीं होती। गर्भ में पल रहे शिशु के साथ मां की संवेदनाएं भी आकार लेती हैं। जिस कारण बच्चे का जन्म मां को ही नया नहीं कर जाता बल्कि उसके व्यक्तित्व व नज़रिये को भी पूर्ण रूप से बदल देता है। जब से औरत का अस्तित्व है वह तभी से सम्मानित है क्यूँकि वह अपने अंदर माँ की ममता व् गुणों को छिपाये हुए होती है। माँ बन कर मृत्यु - तुल्य दुःख व पीड़ा से गुजरकर न केवल जीवित लौटती है बल्कि एक नया रूप लेकर लौटती है जिसमें उसके भाव , आत्मा व अनुभव सब नए होते हैं। माँ होना एक उपलब्धि है। इसके बाद इसके सारे सुख बच्चे से जुड़ जाते हैं। माँ खुद में एक पूर्ण संस्था है , जहां बच्चा न केवल खुद को सुरक्षित महसूस करता है बल्कि बहुत कुछ सीखता भी है। मां समर्पित है और इसी से उसे आनंद भी मिलता है। मां चाहे पुराने जमाने की हो या आज की एक ईंट और पत्थर से बने मकान को घर केवल माँ ही बनाती है। हर घर की धुरी केवल माँ ही होती है और हर रिश्ता उस के संरक्षण में संवरता है।
वक्त के अनुसार ढली आज की माँ : माँ तो माँ ही होती है ,अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए कुछ भी कर जाने को
तैयार रहती है पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाती हुई माँ को कभी भी अपने बारे में सोचने का मौका नहीं मिलता था। पहले व आज के समय की माँ की छवि काफी परिवर्तन हुए है जो की समय की मांग के अनुसार सही भी है। आज जिम्मेदारियों को निभाने के साथ साथ माँ को अपने जीवन के निर्णय लेने के लिए भी स्वतंत्रता का एक नया मंच दिया है। इसीलिए वह नए परिवेश में स्वयं को ढाल कर जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए अपने सपनों को भी नई उड़ान दे रही है। जिस पर हर एक को गर्व है।
कहानी 'मदर्स -डे ' की
मदर्स - डे तो हम सब मनाते है पर माँ को समर्पित इस दिन की शुरुआत के बारे में जानना भी जरूरी है।
1600 ई. में ग्रीक साम्राज्य में मदर्स -डे का उल्लेख मिलता है। तब ग्रीक देवताओं की माँ रेया के सम्मान में मदर्स-डे मनाया जाता था। इसके बाद इंग्लैंड में ईस्टर के चालीस दिनों बाद पड़ने वाले रविवार को ईसा मसीह की माँ 'मरियम' की याद में मनाया जाने लगा। चर्च में विशेष प्रार्थना-सभा के साथ लोग अपने घरों में स्पेशल 'मररिंग केक 'बनाते थे। इंग्लैंड में सामंतो के यहां काम करने वाले मजदूरों को पूरा साल छुट्टी नहीं मिलती थी मगर मदर्स -डे वाले दिन उन्हे अपनी माँ से मिलने के लिए छुट्टी मिलने की परम्परा विकसित हुई।
इसके बाद अमेरिका की सामाजिक कार्यकत्री जूलिया वार्ड हॉवे ने 1870 ई. में वहां फैले गृहयुद्ध के विरोध में अमेरिका की महिलाओं की ओर से एक शान्ति घोषणा पत्र जारी किया गया जिसमें कहा गया की युद्ध में सबसे अधिक निर्दोष महिलाएं व मासूम बच्चे प्रभावित होते है। इसलिए उन्होंने 'मदर्स - डे' को 'मदर्स -डे ऑफ पीस ' का नाम दिया। इस कोशिश को जाविस नामक सामाजिक कार्यकर्ता ने आगे बढ़ाया।
उन्होंने परिवार में भावनात्मक बंधन को मजबूत बनाने के उदेश्य से माँ को उपहार और विशेष सम्मान देने जैसी बातों को भी 'मदर्स-डे ' की परम्परा में शामिल किया। इन्ही प्रयासों के बाद पूरे यूरोप और अमेरिका में 9 मई 1914 को पहली बार मदर्स -डे मनाया गया। उसी के बाद से विश्व में मई के दूसरे रविवार को मदर्स - डे मनाया जाने लगा।
